आईना

जाने वो चपलता ,तेरी वो मुस्कराहट कहाँ चली गयी है?
ज़माने में होते आये है, ज़माने से कई सितम,
पर ये कौन सी क़यामत थी, जो तुझसे तेरी मासूमियत ले गयी है?

देखा है सपनों में तूने तेरे , छोटी सी एक बच्ची को हँसतें खिलखिलाते?
बता ज़रा वो कौन सी सच्चाई थी, जिनमें कैद तेरे ख़्वाबों में ही , वो अब अपना वजूद तलाश गयी है?

देखे तूने अपने कुछ वसंत, तो कुछ पतझड़ भी,
खाए लू के थपेड़े , तो सर्द हवा में ठिठुरन तुझे भी आई है,
पर बता ज़रा वो कौन सी बरसात थी, जो लबों पे मुस्कान देके भी , आँखों की तेरे नमी अब तक भी न चुरा पाई है?

रोज़ मेरे सामने आके तू , बस बेमन से खुद को निहार ,
चली जाती है,
देख मेरी आँखों में अपनी इन बेजान होती जा रही निगाहों की परछाईओं को,
देखा है तूने कभी, किस तरह ये अपनी चमक बस खोती ही चली गयी है?

मै तो लेकिन बस इक आईना हूँ, तू हमेशा की तरह आज , ये सब सुन कर भी, मुझसे आँखें मिलाने तक से भी कतराएगी,
पर बस इतना बता दे, ये आने वाले और बीते हुए कल की कौन सी जंग है,
जो तेरी आज की ज़िन्दगी के जीवन को यूँ निर्जीव बनाती गयी है?

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अमावस

रात अमावस की ये घनी अँधेरी है
न चाँद की चमक, न सितारों की कोई चिंगारी है
है तो बस एक ये भारी दिल और इसके
अंदर बैठा सालों से एक अमावस।

ये जो काला साया है न…
आसमां का है या इस दिल की गहराईयों का
बता पाना थोड़ा मुश्किल है
पर जो भी है… ये रात बहुत काली है।

पता नहीं दिल में बैठा ये डर है कोई
या दिमाग अपनी ही कहानियों के जाल में उलझा हुआ है
एक उम्मीद है की ये रात, जो अमावस की है
कुछ घंटों में गुज़र जाएगी
पर सवाल तो ये है कि क्या ये जो
नादाँ सा दिल है मेरा
और ये इसका जो अमावस है…
क्या कभी इसकी सुबह होगी?

अर्पणा

सौदा

रिश्ते खड़े है बाज़ार में
आज नीलामी है उनकी,
किसकी कितनी बोली लगेगी,
सौदे से तोली जायेगी।
कल तक अहसासों पे चलने वाले रिश्ते
किस हाथ आज बिक जाये किसे पता है?
आंसू है, गम है, कांपते हुए हाथ है,
लड़खड़ाती आवाज़ है तो कही ख़ामोशी है|

सौदागर खड़ा है दरवाजे पर
खरीद ले जाने को रिश्ते आज यहाँ,
ले जायेगा वो उसे अपनी ताजपोशी में
जिससे उसकी शोभा बढ़े, मान दरबार में बढ़े
और पुराने, थके, टूटे हाथ खड़े रह जायेंगे
थमने के इंतज़ार में।
-अर्पणा

ये रात जो गुज़रती नहीं है।

नींद के आगोश में
समाने को,
बेताब हैं यें पलकें
पर आँख मिचौली का कोई खेल
खेल रही है ये रात जैसे।

किसी अधूरे पैगाम के इंतज़ार में,
टक- टकी लगाये,
लग रहा है,
एक ज़माना गुज़र गया हो जैसे।

ये रात वो रात है जो
गुज़रेगी तो
अगली सुबह
इसका मातम मनाएगी,
और गर जो ये न गुज़री
तोे मुसाफिर अगले पल
निकल जायेगा ,
मुठ्ठी में कस के बंद
कोई रेत हो जैसे।

ये रात जो गुज़रती नहीं है
किसी की यादों में कैद है जैसे
आज़ादी की फरियाद भी
ना मंजूर है अब तो
मुज़रिम की गिरफ़्तारी ही
बनी उसकी रिहाई है जैसे।।

©अर्पणा

Failure

Failure is such a strong thing that it can change a person’s life forever. Failure can be of any form it can be board exams, entrance exam, interview or a business project. Though we are told that failures aren’t bad, they are building blocks and a learning phase. Agreed. But when a person fails s/he doesn’t need to listen such things because this is something learnt after success and learnt by the person itself. No amount of failure success stories can make that person feel good. So don’t tell them those. They won’t help. When a person fails s/he starts doubting their all the achievements. They loose confidence. They get very low self esteem and everything suddenly feels gloomy. At that time what a person needs is support. Remind that person that why they matter. Remind them of their goodness and make them feel loved. Tell them you love them even if they failed and the failure doesn’t make any difference in your attitude towards them. Treat them with ice-cream and chocolate and their favourite food because if you truly believe failure is building block or a step nearing to success then this is worth celebrating too.

आज़ादी

फिज़ाओं की चांदनी से दूर
एक गुफा है
जहां रात कभी खत्म नहीं हुई है,
फिर भी परिंदे ने चिंगारियों को समेट
मशाल को जला रखा है।

पर लकड़ियां अब खत्म होने को है,
चिंगारियों की मशाल बुझने को है,
निशा की वापसी होने को है,
कि एक बार फिर सब कुछ खोने को है।

इस गुफ़ा से निकल जाए चकोर तो
चांद शायद दूर ना हो,
ना भी मिले मंज़िल तो शायद वो
भटका ना हो,
लौट के आना भी पड़े तो
काश! का कोई मलाल ना हो
पर डरता है परिंदा की कहीं
आज़ादी की कीमत, कैद ना हो।।

इंतज़ार

ज़िन्दगी के नए पड़ाव पर खड़े है
और पुरानी सारी यादें, बस यादें बन चुकी है
रोज एक जंग होती है आज और कल मे
जहां जी करता है कोई पुरानी ट्रेन पकड़ के
यादों की परछाइयों के पीछे दौड़ लगाऊ
उन्हीं के आगोश में बस सब…
दुनियादारी, रीत सब भूल जाऊ।

उन रिश्तों से जो आज हाथ से
अब फिसलते से लगते है
फिर से मिल आऊ
और बस ये कह पाऊ की
सब कुछ वैसा ही है,
प्यार, इंतज़ार, सब्र
सब वैसा ही है
ये इंसान आज भी नादान उतना ही है
सब खो देने का डर आज भी है
की आज भी हर बात बताने का
करार उतना ही है
घंटो बैठ इंतज़ार में
हर चेहरे मे सिर्फ एक चेहरा
ढूंढने का उत्साह आज भी है।।

पर शायद उस ट्रेन की टिकट आज मिलती नहीं है
मेरी ये आवाज़ कहीं पहुंचती नहीं है
प्लेटफार्म पर खड़े तो होते है रोज
लेकिन कल की तरफ कदम बढ़ते नहीं है।

पर फिर भी इस कल आज की जंग मे
इंतज़ार में बैठा कल… हारता नहीं है।।